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एक मुट्ठी नमक | Hindi Horror Story

आधी रात को जमुना को नमक देता अरविंद और चिंतित सविता
आधी रात को जमुना को नमक देता अरविंद और चिंतित सविता · AI चित्रण

एक मुट्ठी नमक — Hindi Horror Story

काल्पनिक डरावनी कहानी · चित्र AI से बनाए गए हैं।

रात के 12:30 बजे थे। हरिराम के दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने दरवाजा खोला। बाहर एक औरत सफेद साड़ी में खड़ी थी।

उसने सिर झुका कर धीरे से कहा। बाबूजी एक मुट्ठी नमक मिलेगा। हरीराम ने बिना कुछ सोचे अंदर से नमक लाकर उसकी हथेली पर रख दिया। औरत ने नमक लिया।

फिर धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। हरिराम कुछ समझ पाता। उससे पहले ही वो औरत अंधेरे में गायब हो गई। अगली सुबह हरिराम की गाय आंगन में मरी पड़ी थी।

दो दिन बाद उसका 5 साल का बेटा कुएं में मृत मिला और सातवें दिन घर के पीछे वाले खेत से हरिराम की लाश मिली। उसके घर की दीवार पर एक वाक्य लिखा मिला था। वह नमक लेने आती है। लेकिन वापस कुछ और लेकर जाती है।

[हंसी] छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के घने जंगलों के बीच बसे कुसुम डोंगरी गांव में आज भी एक नियम है। सूरज ढलने के बाद [संगीत] कोई किसी को नमक नहीं देता। गांव वाले कहते हैं अगर आधी रात को कोई दरवाजा खटखटाकर सिर्फ एक मुट्ठी नमक मांगे तो दरवाजा कभी मत खोलना क्योंकि इंसान आधी रात को नमक नहीं मांगता। साल 2024 सरकारी शिक्षक अरविंद मिश्रा का तबादला कुसुम डोंगरी [संगीत] गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुआ।

वह अपनी पत्नी सविता और आठ साल के बेटे गोपाल के साथ गांव में रहने आया। उसे स्कूल के पास बना पुराना सरकारी क्वार्टर रहने के लिए मिला। गांव छोटा था। चारों तरफ घना जंगल, मिट्टी के घर और शाम होते ही पूरा इलाका जैसे सो जाता था।

पहले ही दिन सरपंच रामलाल ने गांव वालों से उसका परिचय कराया। सबने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया। लेकिन जब सूरज ढलने लगा, गांव के लोग अचानक अपने-अपने घरों की तरफ लौटने लगे। अरविंद को यह अजीब लगा।

सरपंच जी, अभी तो सिर्फ 7:00 बजे हैं। इतनी जल्दी सब लोग घर क्यों जा रहे हैं? रामलाल कुछ पल चुप रहे। फिर धीरे से बोले मास्टर साहब इस गांव में रात दिन जैसी नहीं होती।

अरविंद हंस पड़ा। [हंसी] आप लोग अभी भी इन पुरानी बातों पर विश्वास करते हैं। रामलाल ने कोई जवाब नहीं दिया। बस धनेश्वर बाबा की तरफ देखने लगे।

सफेद दाढ़ी वाले बूढ़े बाबा धीरे-धीरे उठे और अरविंद के बिल्कुल सामने आकर खड़े हो गए। बेटा भूत प्रेत पर विश्वास करना जरूरी नहीं। लेकिन गांव के नियम तोड़ना बहुत महंगा पड़ता है। कौन सा नियम?

अगर रात में कोई औरत तुम्हारे दरवाजे पर आकर नमक मांगे तो चाहे कुछ भी हो जाए। दरवाजा मत खोलना। अगर कोई सच में मुसीबत में हो तो बाबा ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा जो औरत आधी रात को किसी के घर जाकर सिर्फ नमक मांगती है वो औरत नहीं होती। पूरे आंगन में एकदम सन्नाटा छा गया।

किसी ने कुछ नहीं कहा। अरविंद ने इसे गांव वालों का अंधविश्वास समझकर बात वहीं खत्म कर दी। कुछ दिन सब कुछ बिल्कुल सामान्य रहा। अरविंद स्कूल जाता।

गोपाल नए दोस्तों के साथ खेलने लगा। सविता ने भी गांव की औरतों से मेलजोल बढ़ा लिया। लेकिन एक बात उसने नोटिस की। गांव में सूरज ढलते ही हर घर की औरत सबसे पहले रसोई का नमक लकड़ी के एक छोटे डिब्बे में बंद करके उस पर हल्दी का तिलक लगा देती थी।

और फिर उस डिब्बे को भगवान के सामने रख देती थी। काकी सब लोग नमक ऐसे क्यों रखते हैं? कंगला काकी का चेहरा अचानक उतर गया। उन्होंने तुरंत इधर-उधर देखा जैसे कोई सुन रहा हो।

बहू यह सवाल रात होने से पहले मत पूछा करो। लेकिन क्यों? कमला काकी कुछ बोलती। उससे पहले पास बैठी दूसरी औरत ने उनका हाथ पकड़ लिया।

दोनों बिना कुछ कहे वहां से चली गई। सविता को पहली बार गांव का डर बनावटी नहीं लगा। उस रात करीब 12:20 हुए थे। बाहर तेज हवा चल रही थी।

अचानक घर के दरवाजे पर एक धीमी दस्तक हुई। अरविंद की नींद खुल गई। इतनी रात में कौन हो सकता है? इतनी रात को कौन आया होगा?

अरविंद बिस्तर से उठा। वो दरवाजे की तरफ बढ़ा। तभी उसे धनेश्वर बाबा की बात याद आई। अगर कोई औरत रात में नमक मांगे तो दरवाजा मत खोलना।

वो कुछ पल के लिए रुक गया। लेकिन फिर खुद ही मुस्कुरा दिया। [हंसी] कैसी बेवकूफी है। उसने दरवाजे की कुंडी पकड़ ली और धीरे-धीरे उसे खोलने लगा।

दरवाजा खोलकर उसने देखा बाहर घना अंधेरा था। बरामदे के ठीक सामने करीब 50 साल की एक औरत खड़ी थी। उसने सफेद पुरानी और भीगी हुई साड़ी पहन रखी थी। उसके लंबे बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।

उसका सिर झुका हुआ था। और उसके पैरों के नीचे गीली मिट्टी फैली हुई थी। अरविंद ने सोचा शायद कोई गांव की औरत होगी। अब कौन है आप?

कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया। फिर उस औरत ने बिना सिर उठाए धीमी आवाज में कहा बाबूजी जरा एक मुट्ठी नमक मिल जाएगा। इतना सुनते ही सविता के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे तुरंत धनेश्वर बाबा की बात याद आ गई।

अरविंद दरवाजा बंद करो जल्दी। अरविंद हंस पड़ा। [हंसी] अरे बेचारी मदद मांग रही है। एक मुट्ठी नमक देने से क्या हो जाएगा?

वो रसोई में गया और डिब्बे से एक कटोरी नमक निकाल लाया। जैसे ही उसने नमक उस औरत की हथेली पर रखा, उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा लगा। अरविंद ने चौंक कर उसकी तरफ देखा। पहली बार उस औरत ने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।

सुर्खलाल खून की तरह लाल हो रही थी उसकी आंखें। उसके होठों पर अजीब सी मुस्कान फैल गई। अब मैं फिर आऊंगी। इतना कहकर वो मुड़ी और अंधेरे में चलने लगी।

लेकिन कुछ ही कदम बाद वो अचानक गायब हो गई। सविता डर के मारे आधा दरवाजा बंद कर चुकी थी। मैंने मना किया था आपने क्यों दिया नमक? अरे कोई होगा अंधेरे में चला गया होगा।

तुम लोग बेकार में डरते हो। लेकिन उस रात घर में किसी को भी नींद ठीक से नहीं आई।

सुबह घर के भीतर गीले पैरों के निशान देखते अरविंद और सविता
सुबह घर के भीतर गीले पैरों के निशान देखते अरविंद और सविता · AI चित्रण

सुबह अरविंद दरवाजा खोलकर बाहर निकला और अगले ही पल उसके कदम वहीं रुक गए। बरामदे से लेकर घर के अंदर तक गीली मिट्टी से बने पैरों के निशान थे। ये कैसे हो सकता है? सविता बाहर आई।

निशान देखकर उसके हाथ कांपने लगे। मैंने कहा था वो इंसान नहीं थी। अरविंद ने खुद को समझाया। शायद रात में बारिश हुई होगी।

लेकिन उसे खुद भी अपनी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। उस दिन जब वो स्कूल पहुंचा तो पूरे गांव में उसी की चर्चा हो रही थी। किसी ने रात को उसके घर के बाहर एक औरत को खड़े देखा था। स्कूल की छुट्टी के बाद धनेश्वर बाबा खुद उससे मिलने आए।

तुमने उसे नमक दे दिया। अरविंद कुछ नहीं बोला। उसकी चुप्पी ही जवाब थी। बाबा ने गहरी सांस ली।

अब वो तुम्हें पहचान चुकी है। आप लोग हर बात में भूत क्यों ढूंढते हैं? बाबा ने जेब से एक पुराना ताबीज निकाला। यह अपने घर के दरवाजे पर बांध देना।

और आज से सूरज ढलने के बाद कभी भी अगर कोई दरवाजा खटखटाए तो जवाब मत देना। अरविंद ने ताबीज तो रख लिया लेकिन उसे अब भी इन बातों पर पूरा विश्वास नहीं था। उस रात करीब 1:00 बजे फिर वही दस्तक हुई। इस बार कोई आवाज नहीं आई।

सिर्फ दरवाजे पर लगातार तीन-तीन बार दस्तक होती रही। पूरा घर सन्नाटे में डूब गया। गोपाल डरकर अपनी मां से लिपट गया। तभी खिड़की के बाहर से एक औरत की फुसफुसाती आवाज सुनाई दी।

बाबूजी नमक तो मिल गया। अब दरवाजा भी खोल दो। अरविंद के पूरे शरीर में ठंड दौड़ गई। क्योंकि यह आवाज दरवाजे से नहीं सीधे उसके बेडरूम के खिड़की के बाहर से आ रही थी।

जबकि वो खिड़की जमीन से लगभग 10 फीट ऊपर थी। उस रात अरविंद ने किसी तरह सुबह होने का इंतजार [संगीत] किया। सुबह की पहली किरण पड़ते ही वह सीधे धनेश्वर बाबा के घर पहुंच गया। बाबा आंगन में बैठे हुए थे।

कल रात वह फिर आई थी। है ना? अरविंद कुछ पल तक चुप रहा। फिर उसने रात की पूरी घटना एक-एक करके बता दी।

खिड़की के बाहर सुनाई दी आवाज गीले पैरों के निशान। धनेश्वर बाबा ने गहरी सांस ली। हम अब बात सिर्फ नमक की नहीं रही। आखिर वह है कौन?

बाबा कुछ देर तक चुप रहे। फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया। करीब 50 साल पहले यहीं कुसुम डोंगरी गांव में एक [संगीत] औरत रहती थी। उसका नाम जमुना था।

उसका पति जंगल में लकड़ी काटता था। एक रात वह बीमार पड़ गया। घर में खाने को कुछ नहीं था। दवा खरीदने के पैसे नहीं थे।

और सबसे बड़ी बात घर में एक चुटकी नमक तक नहीं बचा था। उस समय गांव में मान्यता थी कि रात के बाद किसी को नमक नहीं दिया जाता। जमुना एक-एक घर गई। सबके दरवाजे खटखटाए।

बस एक मुट्ठी नमक मांगने बाबा की आवाज भारी हो गई। लेकिन हर किसी ने उसे मना कर दिया। किसी ने दरवाजा तक नहीं खोला। सुबह लोगों ने देखा उसका पति मर चुका था।

और जमुना गांव के बाहर बरगद के पेड़ से लटकी हुई मिली। लेकिन उससे इस सब का क्या संबंध? बाबा ने उसकी तरफ देखा। मरने से पहले उसने पूरे गांव को श्राप दिया था।

उसने कहा था जिस गांव ने मुझे एक मुट्ठी नमक नहीं दिया। मैं उसी गांव से एक-एक आदमी को अपने साथ ले जाऊंगी। तब से हर कुछ साल बाद वो लौटती है। करीब 5 साल पहले गांव का किसान मोहन आधी रात खेत से लौट रहा था।

रास्ते में एक औरत ने उसे रोका। उससे थोड़ा नमक मांगा। मोहन ने कहा, "अभी तो नहीं है सुबह दे दूंगा।" अगली सुबह उसकी बैलगाड़ी जंगल के रास्ते में खड़ी मिली। बैल वहीं बंधे थे।

लेकिन मोहन कभी नहीं मिला। उसके कुछ साल बाद गांव का पोस्टमैन दिलीप रात में ड्यूटी से लौट रहा था। उसने उस औरत को देखा। उसने उससे बात भी की।

वो बच तो गया लेकिन अगले दिन से वो हर आदमी से बस एक ही बात कहता था। वो भूखी है। उसे नमक दे दो। वो फिर आएगी।

कुछ ही दिनों में उसका दिमाग पूरी तरह खराब हो गया। मरते दम तक वो मिट्टी में नमक मिलाकर खाता रहा। इस तरह कई लोगों की जिंदगी खराब हुई है। अरविंद ध्यान से सब सुन रहा था।

लेकिन उसके चेहरे पर अभी भी आधा विश्वास और आधा संदेह था।

पुलिस की टॉर्च की रोशनी में धुंध की तरह गायब होती जमुना
पुलिस की टॉर्च की रोशनी में धुंध की तरह गायब होती जमुना · AI चित्रण

उसी शाम अरविंद ने इंस्पेक्टर चौहान को सारी बातें बताई। इंस्पेक्टर चौहान ने पूरे गांव में गस्त बढ़ा दी। उन्हें लगा कोई अंधविश्वास का फायदा उठाकर लोगों को डरा रहा है। उन्होंने चार सिपाहियों को गांव में अलग-अलग जगह तैनात कर दिया।

रात करीब 12:40 [संगीत] पर गांव के पश्चिम वाले रास्ते पर तैनात एक सिपाही ने दूर सफेद साड़ी पहने एक औरत को धीरे-धीरे चलते देखा। उसने टॉर्च की रोशनी उसकी तरफ डाली। अरे कौन है वहां? औरत रुक गई।

धीरे-धीरे उसने अपना सिर उसकी तरफ घुमाया। जरा एक मुट्ठी नमक मिलेगा। सिपाही ने एक गुस्से में सीटी बजाई। बाकी पुलिस वाले भी दौड़ पड़े।

लेकिन जैसे ही सबकी टॉर्च उस औरत पर पड़ी वो वहीं से धुएं की तरह हवा में बिखर गई। चारों तरफ सिर्फ गीली मिट्टी की गंध रह गई। और जमीन पर नंगे पैरों के निशान जो जंगल की तरफ जा रहे थे। इंस्पेक्टर चौहान पहली बार पूरी तरह चुप हो गए।

अब उन्हें भी समझ आने लगा था कि गांव वाले सिर्फ अंधविश्वास की बातें नहीं कर रहे थे।

नमक की मुट्ठी लिए कमजोर अरविंद और उसे रोकती सविता
नमक की मुट्ठी लिए कमजोर अरविंद और उसे रोकती सविता · AI चित्रण

कुछ दिन बाद अरविंद की हालत धीरे-धीरे बदलने लगी। पहले उसे लगा कि लगातार डर और नींद पूरी ना होने की वजह से ऐसा हो रहा है। लेकिन एक रात उसे एक ऐसा सपना आया जिसने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी। उसने देखा वो अपने घर के आंगन में खड़ा है।

सामने गोपाल खेल रहा है। तभी वही सफेद साड़ी पहने औरत धीरे-धीरे गोपाल के पीछे आकर खड़ी हो जाती है। अरविंद चीख कर उसकी तरफ दौड़ता है। लेकिन जितना वो आगे बढ़ता गोपाल उतना ही दूर जाता दिखाई देता।

फिर उस औरत ने गोपाल का हाथ पकड़ा और अंधेरे की तरफ चलने लगी। अरविंद पूरी ताकत से चिल्लाया। गोपाल गोपाल ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थी और फिर वो औरत गोपाल को लेकर अंधेरे में गायब हो गई।

अरविंद की नींद खुल गई। उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। वो हाफते हुए बिस्तर पर बैठा था। सविता उसकी बगल में सो रही थी।

अगली रात फिर सपना आया। इस बार अरविंद ने खुद को अपने ही घर के अंदर देखा। सविता उसके सामने खड़ी थी। उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी और उसके बगल में वही रहस्यमई औरत खड़ी थी।

दोनों के हाथ में कुछ था। अरविंद पीछे हटने लगा। सविता ने अचानक उसे पकड़ लिया और दोनों मिलकर उसे जमीन पर दबाने लगे। अरविंद चीख रहा था लेकिन उसके मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी।

रहस्यमई औरत उसके कान के बिल्कुल पास झुकी। उसकी आवाज बहुत धीमी थी। नमक दिया था ना? अब अपना हिस्सा भी दो।

अचानक अरविंद की आंख खुल गई। उसने सामने सविता को देखा। वो उसे जगाने की कोशिश कर रही थी। अरविंद क्या हुआ?

तुम इतनी जोर से क्यों चिल्ला रहे थे? अरविंद ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस कांपता रहा। उस रात के बाद उसकी नींद लगभग खत्म हो गई।

दिन में भी उसे लगता कोई उसके पीछे खड़ा है। कभी उसे रसोई से बर्तनों की आवाज सुनाई देती तो कभी बरामदे में किसी के चलने की आहट होती। कुछ ही दिनों में अरविंद का शरीर कमजोर पड़ने लगा। पहले उसका वजन कम हुआ।

फिर उसके चेहरे की चमक चली गई। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए। सविता उसे लेकर डॉक्टर के पास गई। डॉक्टर ने कई जांचे कराई।

दवाइयां दी लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। अरविंद की हालत लगातार बिगड़ती गई। सबसे अजीब बात उसने खाना लगभग छोड़ दिया। चावल, रोटी, दाल कुछ भी खाते ही उसे उल्टी होने लगती।

लेकिन नमक देखते ही उसकी हालत बदल जाती। वो नमक मांगने लगता। सविता थोड़ा नमक दे दो। तुमने अभी खाना भी नहीं खाया।

सिर्फ नमक कैसे खाओगे? मुझे बस नमक चाहिए। कभी मुट्ठी भर नमक हथेली पर रखकर चाटता। कभी कटोरी से सीधा नमक मुंह में डाल देता।

और अगर सविता उसे रोकती तो वो घबरा जाता और कहता मुझे मत रोको। वो वो नाराज हो जाएगी। कौन? अरविंद कुछ सेकंड तक उसे देखता रहता।

फिर धीरे से कहता वही जो उस रात आई थी अब सविता भी डरने लगी थी। गांव के लोग जब अरविंद की हालत देखने आते तो उसे देखकर सहम जाते। कभी वह अकेले में मुस्कुराता तो कभी अचानक किसी को देखकर डर जाता। कई बार वह आधी रात दरवाजे के पास बैठ जाता और नमक की मुट्ठी जमीन पर बिखेरता रहता।

गांव के कुछ बुजुर्ग आखिरकार धनेश्वर बाबा के घर पहुंचे। बाबा अब डॉक्टर भी हाथ खड़े कर चुके हैं। अगर कुछ कर सकते हो तो उसे बचा लो। धनेश्वर बाबा ने सब सुनने के बाद कहा बहुत देर हो चुकी है लेकिन जब तक उसकी सांस चल रही है कोशिश की जा सकती है।

नमक के घेरे में अरविंद को बचाने का प्रयास करते धनेश्वर बाबा
नमक के घेरे में अरविंद को बचाने का प्रयास करते धनेश्वर बाबा · AI चित्रण

उसी रात बाबा अरविंद के घर पहुंचे। उन्होंने घर के दरवाजे से लेकर आंगन तक ध्यान से देखा। फिर उन्होंने घर के चारों कोनों में थोड़ा-थोड़ा नमक रखा। घर के लिविंग रूम में उन्होंने एक गोल घेरा बनाया।

उसके चारों तरफ उन्होंने सरसों के दाने और काले तिल की छोटी-छोटी रेखाएं बनाई। फिर एक पीतल की कटोरी में पानी भरकर उसके ऊपर नीम की पत्तियां रखी। सविता को उन्होंने घर के अंदर रहने को कहा। गोपाल को पड़ोसी के घर भेज दिया।

आज रात चाहे कुछ भी सुनाई दे। दरवाजा मत खोलना। बाबा ने अरविंद को घेरे के बीच चारपाई पर लेटाया। अरविंद की आंखें बंद थी।

लेकिन उसकी उंगलियां लगातार कांप रही थी। बाबा ने धीमी आवाज में मंत्र पढ़ना शुरू किया। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर अचानक घर के बाहर हवा तेज चलने लगी।

दरवाजे अपने आप हिलने लगे। बाबा ने मंत्रोार तेज कर दिया। उन्होंने एक मिट्टी के दिए में सरसों का तेल डाला और उसे अरविंद के सिर के पास रख दिया। फिर नीम की पत्तियों को पानी में डुबोकर अरविंद के शरीर पर हल्का-हल्का छिड़कने लगे।

अचानक अरविंद ने आंखें खोल दी। उसकी आंखों में अजीब चमक थी। नमक कहां है? बाबा ने उसकी तरफ देखा।

तुझे नमक चाहिए। मुझे नहीं। [हंसी] उसे चाहिए। उसी पल घर के बाहर से किसी औरत की आवाज आई।

बाबूजी एक मुट्ठी नमक मिलेगा। सविता डर के मारे चीखने लगी। बाबा ने उसे चुप रहने का इशारा किया। फिर उन्होंने घेरे के चारों तरफ रखा नमक उठाकर एक-एक मुट्ठी आग में डालना शुरू किया।

हर बार नमक आग में गिरता। एक तेज चटकने की आवाज होती और उसी के साथ बाहर से औरत की चीख सुनाई देती। नहीं नहीं बाबा मंत्र पढ़ते रहे। धीरे-धीरे सफेद धुंध कमरे के अंदर भरने लगी।

ए घर छोड़ दे। इस आदमी को छोड़ दे। अचानक बाहर से वो औरत जोर से हंसने लगी। उसकी हंसी इतनी तेज थी कि पूरा घर कांपने लगा।

अरविंद चारपाई पर तड़पने लगा। उसका शरीर अकड़ गया। उसके मुंह से झाग निकलने लगा। सविता रोते हुए उसकी तरफ बढ़ी।

लेकिन बाबा ने उसे रोक दिया। पास मत आना। बाबा ने आखिरी प्रयास करते हुए आग में मुट्ठी भर नमक डाला। अचानक सारी आवाजें बंद हो गई।

अरविंद का शरीर एकदम शांत हो गया। कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा था। सविता ने कांपते हुए उसका नाम पुकारा। अरविंद अरविंद कोई जवाब नहीं आया।

बाबा ने उसकी नब्ज़ टटोली। फिर धीरे से अपना हाथ हटा लिया। अब बहुत देर हो चुकी है। कुछ ही मिनटों में अरविंद की त्वचा का रंग बदलने लगा।

उसका पूरा शरीर धीरे-धीरे सफेद पड़ने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे उसके पूरे शरीर पर सफेद नमक की परत जम गई हो। सविता चीख पड़ी। बाबा बस चुपचाप उस शरीर को देखते रहे।

सुबह अरविंद का अंतिम संस्कार कर दिया गया। उसके बाद उस घर में किसी ने रात को दरवाजा नहीं खोला। कुछ महीनों बाद सविता अपने बेटे गोपाल को लेकर गांव छोड़कर चली गई। लेकिन धनेश्वर बाबा ने उस घर के बाहर आखिरी बार नमक की एक मोटी रेखा खींची और लोगों से कहा याद रखना हर भटकती आत्मा को बुलाने के लिए मंत्र नहीं चाहिए।

कभी-कभी एक छोटी सी गलती ही काफी होती है।

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By Rajesh Sir

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